Story of Premchand in Hindi Font | All Stories Collection of Premchand in Hindi

Read the story of Munshi Premchand in Hindi. We have shared the all best stories collection of Premchand like Push ki Raat, Idghah, Do Bailo ki Katha, Pariksha, Holi, Bade Ghar ki Beti, Godan, Satranj ki Khladi, RangBhumi and others.  Hope you like to read all the famous stories of great writer Premchand. If you have other stories of Premchand in Hindi font then you can share with me. I will publish with your name. Mail your story here

Note: (These all stories are taken by internet: ) All credit of these stories go to different publishers. So I would like to say all of them thanks!!

                                                                  पूस की रात

Poos ki Raat, Great story of Premchand poos ki raat
प्रेमचंद की हिन्दी कहानी पूस की रात हल्क मुन्नी अँधेरी रात जबरा सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी की रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें ? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया । हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ?मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ ?हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै नहीं जानता हूँ !दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें । देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों । दोनों खेत की दशा देख रहे थें । मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था ।मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।

प्रेमचंद की हिन्दी कहानी पूस की रात हल्क मुन्नी अँधेरी रात जबरा सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी की रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें ? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया । हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ?मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ ?हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै नहीं जानता हूँ !दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें । देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों । दोनों खेत की दशा देख रहे थें । मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था ।मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा-सहना आया है । लाओं, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे

मुन्नी झाड़ू लगा  रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं,   दे दोगे तो कम्मल कहॉँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगें। अभी नहीं ।

हल्कू एक क्षण अनिशिचत  दशा में खड़ा रहा । पूस सिर पर आ गया, कम्बल के बिना हार मे रात को वह किसी  तरह सो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियॉं देगा। बला से जाड़ों मे मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी । यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील  लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिध्द करता था ) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके  बोला-दे दे, गला तो छूटे ।कम्मल के लिए कोई दूसरा  उपाय सोचँगा 

मुन्नी उसके पास  से दूर हट गई और ऑंखें तरेरती हुई बोली-कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूँ तो कौन-सा  उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्मल ? न जान कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती । मैं  कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करों, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई । बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ   हैं । पेट के लिए मजूरी करों । ऐसी खेती से  बाज आयें । मैं रुपयें न दूँगी, न दूँगी ।

 हल्कू उदास होकर  बोला-तो क्या गाली खाऊँ ?
मुन्नी ने तड़पकर  कहा-गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है ?
मगर यह कहने के  साथ् ही उसकी तनी हुई भौहें ढ़ीली पड़ गई । हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भॉँति उसे घूर रहा था ।

उसने जाकर आले पर  से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली-तुम छोड़ दो अबकी से  खेती । मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी । किसी की धौंस तो न रहेगी ।  अच्छी खेती है ! मजूरी करके लाओं, वह भी उसी  में झोंक दो, उस पर धौंस ।

हल्कू  ने रुपयें लिये और इस तरह बाहर चला, मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा  हों । उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-काटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किए थें ।  वह आज निकले जा रहे थे । एक-एक पग के साथ उसका मस्तक पानी दीनता के भार से दबा जा रहा  था 

पूस  की अँधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के  किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बॉस के खटाले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर  ओढ़े पड़ा कॉप रहा था । खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी  से कूँ-कूँ कर रहा था । दो मे से एक को भी नींद नहीं आ रही थी ।

 हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए  कहा-क्यों जबरा, जाड़ा लगता है ? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहॉँ क्या लेने आये थें ? अब खाओं ठंड, मै क्या करूँ ? जानते थें, मै। यहॉँ हलुआ-पूरी खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये । अब रोओ  नानी के नाम को ।

जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी  कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ कहा-कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे । यीह रांड पछुआ  न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही हैं । उठूँ, फिर  एक चिलम भरूँ । किसी तरह रात तो कटे ! आठ चिलम तो पी चुका । यह खेती का मजा हैं !  और एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा आए  तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गददे, लिहाफ, कम्बल । मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाए । जकदीर की खूबी  ! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें

हल्कू उठा, गड्ढ़े  मे से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी । जबरा भी उठ बैठा

 हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता हैं, हॉँ जरा, मन  बदल जाता है

जबरा ने उनके मुँह की ओर प्रेम से छलकता हुई  ऑंखों से देखा ।

हल्कू-आज और जाड़ा खा ले । कल से मैं यहाँ  पुआल बिछा दूँगा । उसी में घुसकर बैठना, तब  जाड़ा न लगेगा ।

जबरा ने अपने पंजो उसकी घुटनियों पर रख  दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया ।  हल्कू को उसकी गर्म सॉस लगी ।

 चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके  लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर  एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा । कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भॉँति उसकी  छाती को दबाए हुए था ।

 जब किसी तर न रहा गया, उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर  को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ  रही थी, पर वह उसे अपनी गोद  मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो  इधर महीनों से उसे न मिला था । जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस  कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न ,थी  । अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता । वह अपनी  दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस  दशा को पहुंचा दिया । नहीं, इस अनोखी मैत्री ने  जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था 

सहसा  जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई । इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा  कर रही थी, जो हवा के ठंडें  झोकों को तुच्छ समझती थी । वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा । हल्कू  ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर  वह उसके पास न आया । हार मे चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ  भी जाता, तो तुरंत ही फिर  दौड़ता । कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था ।

एक  घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया।

हल्कू  उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई, ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया हैं, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहीं  है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा,  अभी कितनी रात बाकी है ! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े । ऊपर आ जाऍंगे  तब कहीं सबेरा होगा । अभी पहर से ऊपर रात हैं ।

हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर  आमों का एक बाग था । पतझड़ शुरु हो गई थी । बाग में पत्तियो को ढेर लगा हुआ था ।  हल्कू ने सोच, चलकर पत्तियों  बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ । रात को कोई मुझें पत्तियों बटारते देख तो समझे, कोई भूत है । कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रह जाता ।

उसने पास के अरहर के खेत मे जाकर कई पौधें  उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला  । जबरा ने उसे आते देखा, पास आया और दुम  हिलाने लगा ।
 हल्कू ने कहा-अब तो नहीं रहा जाता जबरू । चलो  बगीचे में पत्तियों बटोरकर तापें । टॉटे हो जाऍंगे, तो  फिर आकर सोऍंगें । अभी तो बहुत रात है। 

जबरा ने कूँ-कूँ करें सहमति प्रकट की और आगे  बगीचे की ओर चला।

बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार  में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था । वृक्षों से ओस की बूँदे  टप-टप नीचे टपक रही थीं । 

एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू  लिए हुए आया । 

हल्कू ने कहा-कैसी अच्छी महक आई जबरू !  तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही हैं ?

जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गई  थी । उसे चिंचोड़ रहा था ।

हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियों  बठारने लगा । जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया था । हाथ ठिठुरे जाते थें । नगें  पांव गले जाते थें । और वह पत्तियों का पहाड़   खड़ा कर रहा था । इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा ।

थोड़ी देर में अलावा जल उठा । उसकी लौ ऊपर  वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी । उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के  विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थें, मानो  उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों । अन्धकार के उस अनंत सागर मे यह  प्रकाश एक नौका के समान  हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था ।

हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था ।  एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों  पॉवं फैला दिए, मानों ठंड को ललकार  रहा हो, तेरे जी में आए सो  कर । ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था ।

उसने  जबरा से कहा-क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही  है ?
जब्बर  ने कूँ-कूँ करके मानो कहा-अब क्या ठंड लगती ही रहेगी ?

‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खातें ।’

 जब्बर  ने पूँछ हिलायी ।

अच्छा  आओ, इस अलाव को कूदकर  पार करें । देखें, कौन निकल जाता है।  अगर जल गए बचा, तो मैं दवा न  करूँगा 

जब्बर ने उस अग्नि-राशि की ओर कातर नेत्रों  से देखा !

मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी ।

यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से  साफ निकल गया । पैरों में जरा लपट लगी, पर  वह कोई बात न थी । जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ । 

हल्कू ने कहा-चलो-चलों इसकी सही नहीं ! ऊपर  से कूदकर आओ । वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया । 

पत्तियॉँ जल चुकी  थीं । बगीचे में फिर अँधेरा छा गया था । राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग  उठती थी, पर एक क्षण में फिर  ऑंखे बन्द कर लेती थी !

 हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास  बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा । उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था ।

 जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू  को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड  था । उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी । फिर ऐसा मालूम हुआ कि  खेत में चर रहीं है। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी।

 उसने दिल में कहा-नहीं, जबरा के होते  कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहॉँ! अब तो  कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!

 उसने  जोर से आवाज लगायी-जबरा, जबरा।

 जबरा  भूँकता रहा। उसके पास न आया।

 फिर  खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना  जहर लग रहा था। कैसा दँदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के  पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।

 उसने  जोर से आवाज लगायी-हिलो! हिलो! हिलो!

 जबरा फिर भूँक उठा  । जानवर खेत चर रहे थें । फसल तैयार हैं । कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए  डालते है।

 हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम  चला, पर एकाएक हवा कस  ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह  फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा  । 

 जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नील गाये खेत का सफाया किए डालती थीं  और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था । अकर्मण्यता ने रस्सियों की भॉति उसे  चारों तरफ से जकड़ रखा था। 

 उसी राख के पस गर्म जमीन परद वही चादर ओढ़  कर सो गया ।

 सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी  की रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें ? तुम  यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया । 

 हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही  है ?

 मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ  मँड़ैया डालने से क्या हुआ ?

हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में  ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै  नहीं जानता हूँ !

दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें । देखा सारा  खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों । 

 दोनों खेत की दशा देख रहे थें । मुन्नी के  मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न  था ।

 मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके  मालगुजारी भरनी पड़ेगी।

हल्कू  ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।

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                                                               परीक्षा


Pariksha premchand hindi Story, Story in Hind Pariksha
नादिरशाह की सेना में दिल्ली के  कत्लेआम कर रखा है। गलियों मे खून की नदियां बह रही हैं। चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ  है। बाजार बंद है। दिल्ली के लोग घरों के द्वार बंद किये जान की खैर मना रहे है।  किसी की जान सलामत नहीं है। कहीं घरों में आग लगी   हुई है, कहीं बाजार लुट रहा है; कोई किसी की फरियाद नहीं सुनता। रईसों की  बेगमें महलो से निकाली जा रही है और उनकी बेहुरती की जाती है। ईरानी सिपाहियों की  रक्त पिपासा किसी तरह नहीं बुझती। मानव हृदया की क्रूरता, कठोरता और पैशाचिकता  अपना विकरालतम रूप धारण किये हुए है। इसी समया नादिर शाह ने बादशाही महल में  प्रवेश किया। 

दिल्ली उन दिनों भोग-विलास  की केंद्र बनी हुई थी। सजावट और तकल्लुफ के सामानों से रईसों के भवन भरे रहते थे।  स्त्रियों को बनाव-सिगांर के सिवा कोई काम न था। पुरूषों को सुख-भोग के सिवा और  कोई चिन्ता न थी। राजीनति का स्थान शेरो-शायरी ने ले लिया था। समस्त प्रन्तो से  धन  खिंच-खिंच कर दिल्ली आता था। और पानी  की भांति बहाया जाता था। वेश्याओं की चादीं थी। कहीं तीतरों के जोड़ होते थे, कहीं  बटेरो और बुलबुलों की पलियां ठनती थीं। सारा नगर विलास –निद्रा में मग्न था। नादिरशाह शाही महल में पहुंचा तो वहां का  सामान देखकर उसकी आंखें खुल गयीं। उसका जन्म दरिद्र-घर में हुआ था। उसका समसत जीवन  रणभूमि  में ही कटा था। भोग विलास का उसे  चसका न लगा था। कहां रण-क्षेत्र के कष्ट और कहां यह सुख-साम्राज्य। जिधर आंख उठती  थी, उधर से हटने का नाम न लेती थी।
    
संध्या हो गयी थी। नादिरशाह अपने सरदारों के साथ महल  की सैर करता और अपनी पसंद की चीजों को बटोरता हुआ दीवाने-खास में आकर कारचोबी मसनद  पर बैठ गया, सरदारों को वहां से चले जाने का हुक्म दे दिया, अपने सबहथियार रख दिये  और महल के दरोगा को बुलाकर हुक्म दिया—मै शाही बेगमों का नाच देखना चाहता हूं। तुम इसी वक्त उनको  सुंदर वस्त्राभूषणों से सजाकर मेरे सामने लाओं खबरदार, जरा भी देर न हो! मै कोई उज्र  या इनकार नहीं सुन सकता। 

दारोगा ने यह नादिरशाही  हुक्म सुना तो होश उड़ गये। वह महिलएं जिन पर सूर्य की दृटि भी नहीं पड़ी कैसे इस  मजलिस में आयेंगी! नाचने का तो कहना ही क्या! शाही बेगमों का इतना अपमान कभी न हुआ  था। हा नरपिशाच! दिल्ली को खून से रंग कर भी तेरा चित्त शांत नहीं हुआ। मगर  नादिरशाह के सम्मुख एक शब्द भी जबान से निकालना अग्नि के मुख में कूदना था! सिर  झुकाकर आदाग लाया और आकर रनिवास में सब वेगमों को नादीरशाही  हुक्म   सुना दिया; उसके साथ ही यह इत्त्ला भी दे दी कि जरा भी ताम्मुल न हो ,  नादिरशाह कोई उज्र या हिला न सुनेगा! शाही खानदोन पर इतनी बड़ी विपत्ति कभी नहीं  पड़ी; पर अस समय विजयी बादशाह की आज्ञा को शिरोधार्य करने के सिवा प्राण-रक्षा का  अन्य कोई उपाय नहीं था। 

बेगमों ने यह आज्ञा सुनी तो  हतबुद्धि-सी हो गयीं। सारेरनिवास में मातम-सा छा गया। वह चहल-पहल गायब हो गयीं।  सैकडो हृदयों से इस सहायता-याचक लोचनों से देखा, किसी ने खुदा और रसूल का सुमिरन  किया; पर ऐसी  एक महिला भी न थी जिसकी  निगाह कटार या तलवार की तरफ गयी हो। यद्यपी इनमें कितनी ही बेगमों की नसों  में राजपूतानियों का रक्त प्रवाहित हो रहा था;  पर इंद्रियलिप्सा ने जौहर की पुरानी आग ठंडी कर दी थी। सुख-भोग की लालसा आत्म  सम्मान का सर्वनाश कर देती है। आपस में सलाह करके मर्यादा की रक्षा का कोई उपाया  सोचने की मुहलत न थी। एक-एक पल भाग्य का निर्णय   कर रहा था। हताश का निर्णय कर रहा था। हताश होकर सभी ललपाओं ने पापी के सम्मुख  जाने का निश्चय किया। आंखों से आसूं जारी थे, अश्रु-सिंचित नेत्रों में सुरमा  लगाया जा रहा था और शोक-व्यथित हृदयां पर सुगंध का लेप किया जा रहा था। कोई केश  गुंथतीं थी, कोई मांगो में मोतियों पिरोती थी। एक भी ऐसे पक्के इरादे की स्त्री न  थी, जो इश्वर पर अथवा अपनी टेक पर, इस आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस कर सके।

एक घंटा भी न गुजरने पाया था  कि बेगमात पूरे-के-पूरे, आभूषणों से जगमगातीं, अपने  मुख की कांति से बेले और गुलाब की कलियों को  लजातीं, सुगंध की लपटें उड़ाती, छमछम करती हुई   दीवाने-खास में आकर नादिरशाह के सामने खड़ी हो गयीं।

नादिर शाह ने एक बार कनखियों  से परियों के इस दल को देखा और तब मसनद की टेक लगाकर लेट गया। अपनी तलवार और कटार  सामने रख दी। एक क्षण में उसकी आंखें झपकने लगीं। उसने एक अगड़ाई ली और करवट बदल  ली। जरा देर में उसके खर्राटों की अवाजें सुनायी देने लगीं। ऐसा जान पड़ा कि गहरी  निद्रा में मग्न हो गया है। आध घंटे तक वह सोता रहा और बेगमें ज्यों की त्यों सिर  निचा किये दीवार के चित्रों की भांति खड़ी रहीं। उनमें दो-एक महिलाएं  जो ढीठ थीं, घूघंट  की ओट से नादिरशाह को देख भी रहीं थीं और आपस  में दबी जबान में कानाफूसी कर रही थीं—कैसा भंयकर स्वरूप है!  कितनी रणोन्मत आंखें है! कितना भारी शरीर है!  आदमी काहे  को है, देव है।

सहसा नादिरशाह की आंखें खुल  गई परियों का दल पूर्ववत् खड़ा था। उसे जागते देखकर बेगमों ने सिर नीचे कर लिये और  अंग समेट कर भेड़ो की भांति एक दूसरे से मिल गयीं। सबके दिल धड़क रहे थे कि अब यह  जालिम नाचने-गाने को कहेगा, तब कैसे होगा! खुदा इस जालिम से समझे! मगर नाचा तो न  जायेगा। चाहे जान ही क्यों न जाय। इससे ज्यादा जिल्लत अब न सही जायगी।

सहसा नादिरशाह कठोर शब्दों में बोला—ऐ  खुदा की बंदियो, मैने तुम्हारा इम्तहान लेने के लिए बुलाया था और अफसोस के साथ  कहना पड़ता है कि तुम्हारी निसबत मेरा जो गुमान था, वह हर्फ-ब-हर्फ सच निकला। जब  किसी कौम की औरतों में गैरत नहीं रहती तो वह कौम मुरदा हो जाती है।

देखना  चाहता था कि तुम लोगों में अभी कुछ गैरत बाकी है या नहीं। इसलिए मैने तुम्हें यहां  बुलाया था। मै तुमहारी बेहुरमली नहीं करना चाहता था। मैं इतना ऐश का बंदा नहीं हूं  , वरना आज भेड़ो के गल्ले चाहता होता। न इतना हवसपरस्त हूं, वरना  आज फारस में सरोद और सितार की तानें सुनाता  होता, जिसका मजा मै हिंदुस्तानी गाने से कहीं ज्यादा उठा सकता हूं। मुझे सिर्फ  तुम्हारा इम्तहान लेना था। मुझे यह देखकर सचा मलाल हो रहा है कि तुममें गैरत  का जौहर बाकी न रहा। क्या यह मुमकिन न था कि  तुम मेरे हुक्म को पैरों तले कुचल देतीं? जब तुम यहां आ गयीं तो मैने तुम्हें एक  और मौका दिया। मैने नींद का बहाना किया। क्या यह मुमकिन न था कि तुममें से कोई  खुदा की बंदी इस कटार को उठाकर मेरे जिगर में चुभा देती। मै कलामेपाक की कसम खाकर  कहता हूं कि तुममें से किसी को कटार पर हाथ रखते देखकर मुझे बेहद खुशी होती, मै उन  नाजुक हाथों के सामने गरदन झुका देता! पर अफसोस है कि आज तैमूरी खानदान की एक बेटी  भी यहां ऐसी नहीं निकली जो अपनी हुरमत बिगाड़ने पर हाथ उठाती! अब यह सल्लतनत जिंदा  नहीं रह सकती। इसकी हसती के दिन गिने हुए हैं। इसका निशान बहुत  जल्द दुनिया से मिट जाएगा। तुम लोग जाओ और हो  सके तो अब भी सल्तनत को बचाओ वरना इसी तरह हवस की गुलामी करते हुए दुनिया से रुखसत  हो जाओगी।

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                                                                ईदगाह



ईदगाह, Idgah story in Hindi
रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना  मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर  अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गॉंव में कितनी हलचल है।  ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते  कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर  पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते  दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से  मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है।  लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे  बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते।  इन्हें गृहस्थी चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है  या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयां खाऍंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों  बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी ऑंखें बदल  लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी  अपनी जेबों में तो कुबेर काधन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर  गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं।  मोहनसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें  लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या।

और सबसे  ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की  भेंट हो गया और मॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता क्या  बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की  गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं।  बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे। अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घर से उसके लिए बड़ी  अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा  तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना  तो राई का पर्वत बना लेती हे। हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर  भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी, तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा, मोहसिन,  नूरे और सम्मी कहॉँ से उतने पैसे निकालेंगे।

अभागिन  अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके  घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर  चली जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस  निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने के क्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है,  बाहर आशा।  विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितबन  उसका विध्वसं कर देगी।

हामिद भीतर  जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।

अमीना का  दिल कचोट रहा है। गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप  अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी।  नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाऍंगे।  जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँ सेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे  होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहॉँ तो घंटों चीजें जमा  करते लगेंगे। मॉँगे का ही तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने  पेसे मिले थे। उस उठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल  ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे  हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटुवें में।  यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा पर लगाए।  धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी। सभी को सेवेयॉँ चाहिए और  थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं।  जिन्दगी खैरियत से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ  है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट जाऍंगे।

गॉँव से  मेला चला। ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल  जाते। फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते। यह लोग क्यों  इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरो में तो जैसे  पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के  दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और  लीचियॉँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता हे। माली  अंदर से गाली देता हुआ निंलता है। लड़के वहाँ से एक फलॉँग पर हैं। खूब हँस रहे हैं।  माली को केसा उल्लू बनाया है।

बड़ी-बड़ी  इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे  इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर  क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां  दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं जाने  देते। और वहॉँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्मॉँ को यह दे दो, क्या  नाम है, बैट, तो  उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढ़क जाऍं।

महमूद ने  कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम। 

मोहसिन बोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं।  जरा-सा बैट पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपने लगेंगे!  सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम  को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ जाए।

 महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं,  उछल-कूद तो  नहीं सकतीं।

मोहसिन—हॉँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी  थी, अम्मॉँ इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें  न पा सका, सच।

आगे चले।  हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयॉँ कौन खाता? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी।  सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते  हैं। अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा  होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूपये  देता है, बिल्कुल ऐसे ही रूपये।

हामिद को  यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को कहॉँ से मिल  जाऍंगी?

 मोहसिन ने  कहा—जिन्नात को रूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाऍं। लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं  रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक  उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए।  अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाऍं।

  हामिद ने  फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?

 मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाए तो  उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस  जाए।

हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ।

 मोहसिन—अब यह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू  में बहुत-से जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर  का नाम बता देगें। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरन्त  बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला।  जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।

अब उसकी  समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है।

 आगे चले।  यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को  बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो जाऍं।  मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में जाकर ‘जागते  रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास  इतने रूपये आते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते  हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें।  अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ से पाते  हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही  बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों  मार लाऍं। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और  नौकरी न चली जाए।

हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं,  तो कोई इन्हें  पकड़ता नहीं?

 मोहसिन  उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन पकड़ेगा!  पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है।  थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई। सारी  लेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के  नीचे सोए,  अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो  बरतन-भॉँड़े आए। 

हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?

‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ। पचास एक थैली-भर  होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?

 अब बस्ती  घनी होने लगी। ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी। एक से एक भड़कीले वस्त्र  पहने हुए। कोई इक्के-तॉँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग।  ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष  ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस  चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से आर्न की  आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।

सहसा ईदगाह  नजर आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया हे। नाचे पक्का फर्श है,  जिस पर जाजम ढिछा हुआ है। और  रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जाने कहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक,  जहॉँ जाजम भी  नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हे।  यहॉँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हें। इन ग्रामीणों ने  भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते  हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं,  एक साथ झुकते  हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती हे, जैसे  बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं,  विस्तार और  अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती  थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन  समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं। 

नमाज खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब  मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों  से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला हें एक पैसा देकर  चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें,  कभी जमीन पर  गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं। एक पेसा देकर बैठ जाओं और पच्चीस  चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते  हें। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई  जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।

सब  चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। अधर दूकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह  के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्ती और धोबिन और साधु।  वह! कत्ते सुन्दर खिलोने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें  पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर  झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं मशक का मुँह एक  हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी अड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम हे।  कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर! काला चोगा,  नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी  जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए।  मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए  चले आ रहे है। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह केसे ले? खिलौना  कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए। ऐसे  खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के!

मोहसिन  कहता है—मेरा भिश्ती  रोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरे
महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा।

नूरे—ओर मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।

सम्मी—ओर मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।

 हामिद  खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं,  लेकिन ललचाई  हुई ऑंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में  ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हें, लेकिन लड़के इतने त्यागी  नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद  ललचता रह जाता है।

खिलौने के  बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी  ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है।  अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबक ओर देखता है।

 मोहसिन  कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!

 हामिद को  सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद हें मोहसिन इतना  उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता  है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ  फैलाता  है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में  रख लेता है। महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया  जाता है।

 मोहसिन—अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा।

हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं है?
सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगें?
महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है।
हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयॉँ लिखी  हैं।
मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों  नहीं निकालते?
महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे  पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।

 मिठाइयों  के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों  की। लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पररूक जात हे। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे  ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तबे से  रोटियॉँ उतारती हैं,  तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह  कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो  जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते  हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता। यह  तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे। चिमटा कितने काम की चीज है।  रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई  आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्मॉँ बेचारी को कहॉँ  फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज हाथ जला लेती हैं।

 हामिद के साथी  आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब  कतने लालची हैं। इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी।  उस पर कहते है, मेरे  साथ खेलो। मेरा यह काम करों। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो  पूछूँगा। खाऍं मिठाइयॉँ, आप  मुँह सड़ेगा,  फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही  जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें  थोड़े ही लिखी हें। मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी  और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के लिए चिमटा लाया है। 

कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन  इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों का दुआऍं सीधे अल्लाह के दरबार  में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। में भी इनसे  मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते। आखिर अब्बाजान कभीं न कभी  आऍंगे। अम्मा भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने  खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और  दिखा हूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है। यह नहीं कि एक पैसे की  रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब  हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हंसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?

दुकानदार  ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी!
‘बिकाऊ है कि नहीं?
‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?
तो बताते  क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छ: पैसे लगेंगे।
हामिद का  दिल बैठ गया।
ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे,  लेना हो लो, नहीं चलते बनो।‘
हामिद ने  कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?

 यह कहता  हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियॉँ  नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा  सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते  हैं!

मोहसिन ने  हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?

हामिद ने  चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन पर  गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की।
महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?

 हामिद—खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों  का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे काकाम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे  खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका  नही कर सकतें मेरा बहादुर शेर है चिमटा।

सम्मी ने  खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।

हामिद ने  खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेट फाड़ डाले।  बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा  बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा  रहेगा।

चिमटे ने  सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हें, नौ  कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की  जल्दी हो रही हे। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता।  हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।

अब बालकों  के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं,  हामिद अकेला  दूसरी तरफ। शास्त्रर्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद से  एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के  आघातों से  आतंकित हो उठे हैं। उसके पास  न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी  ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है।  वह अजेय है,  घातक है। अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ  भिश्ती के छक्के छूट जाऍं,  जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे,  वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर  की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।

मोहसिन ने  एड़ी—चोटी का जारे लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता? 
हामिद ने  चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।

 मोहसिन  परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो अदालम में बॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो  वकील साहब के पैरों पड़ेगे।

हामिद इस  प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?
 नूरे ने  अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला।
हामिद ने  मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें! अच्छा लाओ, अभी  जरा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगें क्या बेचारे!

मोहसिन को  एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में  जलेगा।

उसने समझा  था कि  हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लैडियों  की तरह घर में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है,  जो यह  रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।

महमूद ने  एक जोर लगाया—वकील साहब कुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो  बाबरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?

 इस तर्क ने  सम्मी औरनूरे को भी सजी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही हे पट्ठे ने! चिमटा  बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?

हामिद को  कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर  बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और  उनका कानून उनके पेट  में डाल देगा।

 बात कुछ  बनी नही। खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट में  डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा  कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज  हे। उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती हे।  हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द हे। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति  नहीं हो सकती।

 विजेता को  हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है,  वह हामिद को भी  मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा  लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?

 संधि की  शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमार भिश्ती लेकर देखो।

महमूद और  नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।

हामिद को इन शर्तो को मानने में कोई  आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और  उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं

हामिद ने  हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर  करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले।

लेकिन  मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया  है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।

मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?

महमूद—दुआ को लिय फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मां जरूर कहेंगी  कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?

हामिद को  स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे  सब-कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब  तो चिमटा रूस्तमें—हिन्द हे ओर सभी खिलौनों का बादशाह।

 रास्ते में  महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दियें। महमून ने केवल हामिद को साझी  बनाया। उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद थां।    

ग्यारह बजे गॉँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए।  मोहसिन की छोटी बहन दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियॉं भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन  में मार-पीट हुई। दानों खुब रोए। उसकी अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर  से दो-दो चॉँटे और लगाए।

मियॉँ नूरे  के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक  पर हो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ  गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिदाया गया।  वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू  किया। आदालतों में खर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हें। क्या यहॉँ मामूली  पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरे हवा करने लगें मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से  मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से  मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।

अब रहा  महमूद का सिपाही। उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए जिसमें  सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने  लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हें। मगर रात  तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग जाती है।  टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये जमीन पर आ  जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है। 

महमूद को  आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी  टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग  जावब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़  दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टॉँग से तो न चल सकता  था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही  संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन  जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहों, कर सकते हो। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।

 अब मियॉँ  हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार  करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।

यह चिमटा कहॉं था?’

‘मैंने मोल लिया है।‘

‘कै पैसे में?

‘तीन पैसे दिये।‘

अमीना ने  छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ  खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?’

 हामिद ने  अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ तवे से जल जाती  थीं, इसलिए मैने इसे लिया।

बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में  बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता  है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और  मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा?  इतना जब्त इससे  हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की  याद बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।

और अब एक  बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद कें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े  हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन  फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी।  हामिद इसका रहस्य क्या समझता!

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                                                            होली की छुट्टी

Holi ki Chutti - Premchand story
वर्नाक्युलर फ़ाइनल पास करने के बाद मुझे एक प्राइमरी  स्कूल में जगह वमिली, जो मेरे घर से ग्यारह मील पर था। हमारे हेडमास्टर साहब को  छुट्टियों में भी लड़कों को पढ़ाने की सनक थी। रात को लड़के खाना खाकर स्कूल में आ  जाते और हेडमास्टर साहब चारपाई पर लेटकर अपने खर्राटों से उन्हें पढ़ाया करते। जब  लड़कों में धौल-धप्पा शुरु हो जाता और शोर-गुल मचने लगता तब यकायक वह खरगोश की  नींद से चौंक पड़ते और लड़को को दो- चार तकाचे लगाकर फिर अपने सपनों  के मजे लेने लगते। ग्यायह-बारह बजे रात तक यही  ड्रामा होता रहता, यहां तक कि लड़के नींद से बेक़रार होकर वहीं टाट पर सो जाते।  अप्रैल में सलाना इम्तहान होनेवाला था, इसलिए  जनवरी ही से हाय-तौ बा मची हुई थी। नाइट स्कूलों पर इतनी रियायत थी कि रात की  क्लासों में उन्हें न तलब किया जाता था, मगर छुट्टियां बिलकुल न मिलती थीं। सोमवती  अमावस आयी और निकल गयी, बसन्त आया और चला गया,शिवरात्रि आयी और गुजर गयी। और  इतवारों का तो जिक्र ही क्या है।  एक दिन  के लिए कौन इतना बड़ा सफ़र करता,  इसलिए कई  महीनों से मुझे घर जाने का मौका  न मिला  था। मगर अबकी मैंने पक्का इरादा कर लिया था कि होली परर जरुर घर जाऊंगा, चाहे  नौकरी से हाथ ही क्यों न धोने पड़ें। मैंने एक हफ्ते पहले से ही हेडमास्टर साहब को  अल्टीमेटम दे दिया कि २० मार्च को होली की छुट्टी शुरु होगी और बन्दा १९ की शाम को  रुखसत हो जाएगा। हेडमास्टर साहब ने मुझे समझाया कि अभी लड़के हो, तुम्हें क्या  मालूम नौकरी कितनी मुश्किलों से मिलती है और कितनी मुश्किपलों से निभती है, नौकरी  पाना उतना मुश्किल  नहीं जितना उसको  निभाना। अप्रैल में इम्तहान होनेवाला है, तीन-चार दिन स्कूल बन्द रहा तो बताओ  कितने लड़के पास होंगे ?  साल-भर की सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा कि नहीं ? मेरा कहना  मानो, इस छुट्टी में न जाओ, इम्तसहान के बाद जो  छुट्टी  पड़े उसमें चले जाना। ईस्टर की चार  दिन की छुट्टी होगी, मैं एक दिन के लिए भी न रोकूंगा।

मैं अपने मोर्चे पर काय़म रहा,  समझाने-बुझाने, डराने –धमकाने और जवाब-तलब किये  जाने के हथियारों का मुझ पर असर न हुआ।  १९  को ज्यों ही स्कूल बन्द हुआ,  मैंने  हेडमास्टर साहब को सलाम भी न किया और चुपके से अपने डेरे पर चला आया। उन्हें सलाम  करने जाता तो वह एक न एक काम  निकालकर मुझे  रोक लेते- रजिस्टर में फ़ीस की मीज़ान लगाते जाओ, औसत हाज़िरी निकालते जाओ, लड़को  की कापियां जमा करके उन पर संशोधन और तारीख सब पूरी कर दो।  गोया यह मेरा आखिरी सफ़र  है और मुझे जिन्दगी के सारे काम अभी खतम कर  देने चाहिए।

मकान पर आकर मैंने चटपट अपनी किताबों  की पोटली उठायी, अपना हलका लिहाफ़ कंधे पर रखा   और स्टेशन के लिए चल पड़ा। गाड़ी ५ बजकर ५ मिनट पर जाती थी। स्कूल की  घड़ी  हाज़िरी के वक्त हमेशा आध घण्टा तेज  और छुट्टी के वक्त  आधा घण्टा सुस्त रहती  थी। चार बजे स्कूल बन्द हुआ था। मेरे खयाल में स्टेशन पहुँचने के लिए काफी वक्त  था। फिर भी मुसाफिरों को गाड़ी की तरफ से आम तौर पर जो अन्देशा लगा रहता है,  और जो घड़ी हाथ में होने परर भी और गाड़ी का  वक्त ठीक मालूम होने पर    भी दूर से किसी  गाड़ी की गड़गड़ाहट या सीटी  सुनकर कदमों  को तेज और दिल को परेशान कर दिया करता है, वह मुझे भी लगा हुआ था। किताबों की  पोटली भारी थी, उस पर कंध्णे पर लिहाफ़, बार-बार हाथ बदल ता और लपका चला जाता था।  यहां तक कि स्टेशन कोई  दो फ़र्लांग  से नजर आया। सिगनल डाउन था। मेरी हिम्मत भी उस  सिगनल की तरह डाउन हो गयी, उम्र के तक़ाजे से   एक सौ क़दम दौड़ा  जरुर मगर यह  निराशा की हिम्मत थी।  मेरे देखते-देखते  गाड़ी आयी, एक मिनट ठहरी और रवाना हो गयी।  स्कूल  की घड़ी यक़ीनन आज और दिनों से भी  ज्यादा सुस्त थी।

अब स्टेशन पर जाना बेकार था। दूसरी गाड़ी  ग्यारह बजे रात को आयगी,  मेरे घरवाले  स्टेशन पर कोई  बारह बजे पुहुँचेगी और वहां  से मकान पर जाते-जाते एक बज जाएगा। इस सन्नाटे में रास्ता  चलना भी एक मोर्चा था जिसे जीतने की मुझमें  हिम्मत न थी। जी में तो आया कि चलकर हेडमास्टर को आड़े हाथों लूं मगरी जब्त किया  और  चलने के लिए तैयार हो गया। कुल बारह  मील ही तो हैं, अगर दो मील फ़ी घण्टा  भी  चलूं तो छ: घण्टों में घर  पहुँच सकता हूँ।  अभी  पॉँच बजे हैं, जरा क़दम बढ़ाता जाऊँ  तो दस बजे  यकीनन पहुँच जाऊँगा। अम्मं  और   मुन्नू  मेरा इन्तजार  कर रहे होंगे, पहुँचते ही गरम-गरम खाना मिलेगा।  कोल्हाड़े में गुड़ पक रहा होगा, वहां से गरम-गरम   रस पीने को आ जाएगा और जब लोग सुनेंगे कि मैं इतनी दूर पैदल आया हूँ तो  उन्हें कितना अचवरज होगा!  मैंने फ़ौरन गंगा  की तरफ़   पैर बढ़ाया। यह क़स्बा नदी के किनारे था और मेरे गांव  की सड़क नदी के उस पार से थी। मुझे इस रास्ते  से जाने का कभी संयोग न हुआ था, मगर इतना सुना था कि  कच्ची सड़क सीधी चली  जाती है, परेशानी की कोई बात न थी, दस मिनट में  नाव पार पहुँच जाएगी और बस फ़र्राटे भरता चल दूंगा। बारह मील कहने को तो होते हैं,  हैं तो कुल छ: कोस। 

मगर घाट पर पहुँचा तो नाव में से आधे  मुसाफिर  भी न बैठे थे। मैं कूदकर जा  बैठा।  खेवे के पैसे भी निकालकर दे दिये  लेकिन नाव है कि वहीं अचल ठहरी हुई है। मुसाफिरों   की संख्या काफ़ी नहीं है,  कैसे  खुले। लोग तहसील  और कचहरी से आते जाते हैं  औ बैठते जाते हैं और मैं  हूँ कि अन्दर हीर  अन्दर भुना जाता हूँ। सूरज नीचे दौड़ा  चला  जा रहा है, गोया  मुझसे बाजी लगाये हुए  है।  अभी सफेद था, फिर पीला होना शुरु हुआ  और देखते – देखते लाल हो गया। नदी के उस पार  क्षितिजव पर लटका हुआ, जैसे कोई डोल कुएं पर लटक रहा है। हवा  में कुछ खुनकी भी आ गयी, भूख भी मालूम होने  लगी। मैंने आज धर जाने की खुशी और हड़बड़ी में रोटियां न पकायी थीं, सोचा था कि  शाम को तो  घर पहुँच जाऊँगा ,लाओ एक पैसे  के चने लेकर खा लूं। उन दानों ने इतनी देर   तक तो साथ दिया ,अब पेट की पेचीदगियों में जाकर न जाने कहां गुम हो गये।  मगर क्या गम है, रास्ते में क्या दुकानें न होंगी, दो-चार पैसे की मिठाइयां लेकर  खा लूंगा।

जब नाव उस किनारे पहुँची तो सूरज की  सिर्फ अखिरी सांस  बांकी थी, हालांकि नदी  का पाट बिलकुल पेंदे में चिमटकर रह गया था। 

मैंने पोटली उठायी और तेजी से चला।  दोनों तरफ़ चने के खेते थे जिलनके ऊदे फूलों पर ओस सका हलका-सा पर्दा पड़ चला था।  बेअख्त़ियार एक खेत में घुसकर बूट उखाड़ लिये और टूंगता हुआ भागा। 

सामने बारह मील की मंजिल है, कच्चा सुनसान रास्ता, शाम  हो गयी है, मुझे पहली बार गलती मालूम हुई। लेकिन बचपन के जोश ने कहा, क्या बात है, एक-दो मील तो दौड़ ही सकते हैं। बारह को मन में  १७६० से गुणा किया, बीस हजार गज़  ही तो  होते हैं। बारह मील के मुक़ाबिले में बीस हज़ार गज़ कुछ हलके और आसान मालूम  हुए।  और जब दो-तीन मील रह जाएगा तब तो एक  तरह से अपने गांव ही में हूंगा, उसका क्या शुमार। हिम्मत बंध गयी। इक्के-दुक्के  मुसाफिर भी पीछे चले आ रहे थे, और इत्मीनान हुआ।

अंधेरा हो गया है, मैं लपका जा रहा  हूँ। सड़क के किनारे दूर से एक झोंपड़ी नजर आती है।  एक कुप्पी जल रही है। ज़रुर किसी बनिये की  दुकान होगी। और कुछ न होगा तो गुड़ और चने तो मिल ही जाएंगे। क़दम और तेज़ करता  हूँ। झोंपड़ी आती है। उसके सामने एक क्षण के निलए खड़ा हो जाता हूँ। चार –पॉँच आदमी उकड़ूं बैठे हुए हैं, बीच में एक बोतल है, हर एक के  सामने एक-एक कुल्हाड़। दीवार से मिली हुई ऊंची गद्दी है, उस पर साहजी बैठे हुए  हैं, उनके सामने कई बोतलें रखी हुई हैं। ज़रा    और पीछे हटकर एक आदमी कड़ाही  में  सूखे मटर भून रहा है। उसकी  सोंधी खुशबू  मेरे शरीर  में बिजली की तरह दौड़ जाती है।  बेचैन होकर जेब में हाथ  डालता हूँ और एक  पैसा निकालकर उसकी तरफ चलता हूँ लेकिन   पांव  आप ही रुक जाते हैं – यह कलवारिया है। 

खोंचेवाला  पूछता है – क्या लोगे ?

मैं कहता हूं – कुछ नहीं।

और आगे बढ़ जाता हूँ। दुकान भी मिली  तो शराब की, गोया दुनियसा में इन्सान के लिए शराब रही सबसे जरुरी चीज है। यह सब  आदमी धोबी और चमार होंगे, दूसरा कौन शराब पीता है, देहात में। मगर वह मटर का  आकर्षक सोंधापन मेरा पीछा कर रहा है और मैं भागा जा रहा हूँ। 

किताबों की पोटली जी का जंजाल हो गया  है, ऐसी इच्छा होती है कि इसे यहीं सड़क पर पटक दूं।  उसका वज़न मुश्किल से पांच सेर होगा, मगर इस  वक्त मुझे मन-भर से ज्यादा मालूम हो रही है। शरीर में कमजोरी महसूस  हो रही है। पूरनमासी का चांद पेड़ो के  ऊपर जा बैठा है और पत्तियों के बीच  से जमीन की तरफ झांक रहा है।  मैं बिलकुल अकेला जा रहा हूँ, मगर दर्द बिलकुल  नहीं है, भूख  ने सारी चेतना  को दबा रखा   है और खुद उस पर हावी  हो गयी है। 

आह हा, यह गुड़ की खुशबू कहां से  आयी ! कहीं ताजा गुड़ पक रहा है।  कोई गांव क़ रीब ही होगा। हां, वह आमों  के  झुरमुट में रोशनी नजर आ रही है। लेकिन वहां पैसे-दो पैसे  का गुड़ बेचेगा और यों मुझसे मांगा न जाएगा,  मालूम नहीं लोग क्या समझें। आगे बढ़ता हूँ, मगर जबान से लार टपक रही हैं गुउ़ से  मुझे बड़ा प्रेम है। जब कभी किसी चीज  की  दुकान खोलने की सोचता था  तो वह हलवाई की  दुकान होती थी। बिक्री हो या न हो,   मिठाइयां तो खाने को मिलेंगी। हलवाइयों को देखो, मारे मोटापे के हिल नहीं  सकते। लेकिन वह बेवकूफ होते हैं, आरामतलबी के मारे तोंद निकाल लेते हैं,  मैं कसरत करता रहूँगा। मगर गुड़ की वह धीरज की  परीक्षा लेनेवाली, भूख को तेज करनेवाली खूशबू बराबर आ रही है। मुझे वह घटना याद  आती है, जब अम्मां तीन महीने के लिए अपने मैके या मेरी ननिहाल गयी थीं और मैंने  तीन महीने के एक मन गुड़ का सफ़ाया कर दिया था।   यही गुड़ के दिन थे। नाना बिमार थे, अम्मां  को बुला भेजा था। मेरा इम्तहान पास था इसलिए  मैं उनके साथ न जा सका, मुन्नू को लेती गयीं। जाते वक्त उन्होंने एक मन गुउ़ लेकर  उस मटके में रखा और उसके मुंह  पर सकोरा  रखकर मिट्टी से बन्द कर दिया।  मुझे  सख्त  ताकीद कर दी कि मटका न खोलना। मेरे  लिए थोड़ा-सा गुड़ एक हांडी में रख दिया था। वह हांड़ी मैंने एक हफ्ते में सफाचट  कर दी सुबह को दूध के साथ गुड़, रात को फिर   दूध के साथ गुउ़। यहॉँ तक  जायज  खर्च था जिस पर अम्मां को भी कोई एतराज न हो सकता।  मगर स्कूलन से बार-बार पानी पीने के बहाने घर  आता और दो-एक पिण्डियां निकालकर खा लेता- उसकी बजट में कहां गुंजाइश थी। और मुझे  गुड़ का कुछ ऐसा चस्का पड़ गया कि हर वक्त वही नशा सवार रहता। मेरा घर में आना  गुड़ के सिर शामत  आना था। एक हफ्ते में  हांडी  ने जवाब दे दिया। मगर मटका खोलने की  सख्त मनाही थी और अम्मां के ध्ज्ञर आने में अभी पौने तीन महीने ब़ाकी थे। एक दिन  तो मैंने बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे सब्र किया लेकिन  दूसरे दिन क आह के साथ सब्र जाता रहा और मटके  को बन्द कर दिया और संकल्प कर लिया कि इस हांड़ी को तीन महीने चलाऊंगा। चले या न  चले, मैं चलाये जाऊंगा। मटके को वह सात मंजिल समझूंगा जिसे रुस्तम भी न खोल  सका  था।  मैंने मटके की पिण्डियों को कुछ इस तरह कैंची लगकार रखा कि जैसे बाज  दुकानदार दियासलाई  की डिब्बियां भर देते हैं। एक हांड़ी गुउ़ खाली  हो जाने पर भी मटका मुंहों मुंह भरा था।   अम्मां को पता ही चलेगा,  सवाल-जवाब  की नौबत कैसे आयेगी। मगर दिल और जान में वह खींच-तान शुरु हुई कि क्या कहूं, और हर  बार जीत जबान ही के हाथ रहती। यह दो अंगुल की जीभ दिल जैसे शहज़ोर पहलवान को नचा  रही थी, जैसे मदारी बन्दर को नचाये-उसको, जो आकाश में उड़ता है और सातवें आसमान के  मंसूबे बांधता है और अपने जोम में फ़रऊन को भी कुछ नहीं समझता। बार-बार इरादा  करता, दिन-भर में पांच पिंडियों से ज्यादा न खाऊं लेकिन यह इरादा शाराबियों की  तौबा की तरह घंटे-दो से ज्यादा न टिकता। अपने को कोसता, धिक्कारता-गुड़ तो खा रहे  हो मगरर बरसात में सारा शरीर सड़ जाएगा, गंधक का मलहम लगाये घूमोगे, कोई तुम्हारे  पास बैठना भी न पसन्द करेगा ! कसमें खाता, विद्या की, मां  की, स्वर्गीय पिता की, गऊ की, ईश्वर की, मगर उनका भी वही हाल होता। दूसरा  हफ्ता  खत्म होते-होते हांड़ी भी खत्म हो  गयी। उस दिन मैं ने बड़े भक्तिभाव से ईश्वर से प्रार्थना की – भगवान्, यह मेरा चंचल लोभी मन मुझे परेशान कर रहा है, मुझे  शक्ति दो कि उसको वश में रख सकूं। मुझे अष्टधात की लगाम दो जो उसके मुंह में डाल  दूं! यह अभागा मुझे अम्मां से पिटवाने  आैर घुड़कियां खिलवाने पर तुला हुआ है, तुम्हीं मेरी रक्षा करो तो बच सकता हूँ।  भक्ति की विह्वलता के मारे मेरी आंखों से दो- चार बूंदे आंसुओं की भी गिरीं लेकिन  ईश्वर ने भी इसकी सुनवायी न की और गुड़ की बुभुक्षा मुझ पर छायी रही ; यहां तक कि दूसरी हांड़ी का मर्सिया पढ़ने कीर नौबत आ  पहुँची।

संयोग से उन्हीं दिनों तीन दिन की  छुट्टी हुई और मैं अम्मां  से मिलने  ननिहाल  गया।  अम्मां ने पूछा- गुड़ का  मटका देखा है? चींटे  तो नहीं लगे? सीलत तो नहीं पहुँची? मैंने मटकों  को देखने की कसम  खाकर अपनी ईमानदारी का  सबूत दिया। अम्मां ने मुझे गर्व के नेत्रों से देखा  और मेरे आज्ञा- पालन के पुरस्कार- स्वरुप मुझे  एक हांडी निकाल लेने की इजाजत दे दी, हां, ताकीद भी करा दी कि मटकं  का मुंह अच्छी तरह बन्द कर देना। अब तो वहां  मुझे एक-एक –दिन एक –एक युग मालूम होने लगा। चौथे दिन घर आते ही मैंने पहला काम जो  किया वह मटका खोलकर हांड़ी – भर गुड़ निकालना था।  एकबारगी पांच पींडियां उड़ा गया फिर वहीं  गुड़बाजी शुरु हुई। अब क्या गम हैं, अम्मां की इजाजत मिल गई थी। सैयां  भले कोतवाल, और आठ दिन में हांड़ी गायब ! आखिर मैंने अपने दिल की कमजोरी से मजबूर होकर मटके की कोठरी  के दरवाजे पर ताला डाल दिया और कुंजी दीवार की एक मोटी संधि में डाल दी।  अब देखें   तुम कैसे गुड़  खाते हो। इस संधि  में से कुंजी निकालने का मतलब यह था कि तीन हाथ दीवार खोद डाली जाय और यह हिम्म्त  मुझमें न थी। मगर तीन दिन में ही मेरे धीरज का प्याला छलक उठा औ इन तीन दिनों में  भी दिल की जो हालत  थी वह बयान से बाहर है।  शीरीं, यानी मीठे गुड़, की कोठरी की तरफ से बार- बार गुजरता और अधीर नेत्रों से  देखता और हाथ मलकर रह जाता। कई बार ताले को खटखटाया,खींचा, झटके दिये, मगर जालिम  जरा भी न हुमसा। कई बार जाकर उस संधि की जांच   -पडताल की, उसमें झांककर देखा, एक लकड़ी से उसकी गहराई का अन्दाजा लगाने की  कोशिश  की मगर उसकी  तह न मिली। तबियत खोई हुई-सी रहती, न खाने-पीने  में कुछ मज़ा था, न खेलने-कूदने में। वासना बार-बार युक्तियों के जारे खाने-पीने  में  कुछ मजा था, न खेलने-कूदने में। वासना  बार-बार युक्तियों के जोर से दिल को कायल करने की कोशिश  करती। आखिर गुड़ और किस मज्र् की दवा है। मे।  उसे फेंक तो देता नहीं, खाता ही तो हूँ, क्या आज खाया और क्या एक महीनेबाद खाया,  इसमें क्या फर्क है। अम्मां  ने मनाही की  है बेशक  लेकिन उन्हे ंमुझेस एक उचित काम  से अलग रखने का क्या  हक है? अगर वह आज   कहें खेलने मत जाओ या पेंड़ पर  मत चढ़ो या तालाब में तैरने मत जाओ, या  चिड़ियों के लिए कम्पा मत लगाओ, तितलियां मत पकड़ो, तो क्या में माने लेता हूँ ?  आखिर चौथे दिन वासना की जीत हुई। मैंने तड़के उठकर एक कुदाल  लेकर दीवार खोदना शुरु किया। संधि थी ही, खोदने  में ज्यादा देर न लगी,  आध घण्टे के घनघोर  परिश्रम के बाद दीवार से कोई गज-भर लम्बा और तीन इंच मोटा चप्पड़ टूटकर नीचे गिर  पड़ा और संधि की तह में वह सफलता की कुंजी पड़ी हुई थी, जैसे समुन्दर की तह में  मोती की सीप  पड़ी हो। मैंने झटपट उसे  निकाला और फौरन दरवाजा खोला,  मटके से गुउ़  निकालकर हांड़ी में भरा और दरवाजा बन्द कर दिया। मटके  में इस लूट-पाट से स्पष्ट कमी पैदा हो गयी  थी।  हजार तरकीबें आजमाने पर भी इसका गढ़ा  न भरा। मगर अबकी बार  मैंने चटोरेपन का  अम्मां की वापसी  तक खात्मा कर देने के लिए  कुंजी को कुएं में डाल दिया। किस्सा लम्बा है , मैंने कैसे ताला तोड़ा,  कैसे गुड़ निकाला  और मटका खाली हो जाने पर कैसे फोड़ा और उसके  टुकड़े  रात को कुंए में फेंके और अम्मां  आयीं तो मैंने कैसे रो-रोकर उनसे मटके  के  चोरी जाने  की कहानी कही, यह बयन करने लगा  तो यह घटना जो मैं आज लिखने बैठा हूँ अधूरी   रह जाएगी। 

चुनांचे इस वक्त गुड़ की उस मीठी खुशबू ने मुझे बेसुध  बना दिया। मगर मैं सब्र करके आगे बढ़ा।

ज्यों-ज्यों  रात गुजरती थी, शरीर थकान से चूर होता जाता था, यहॉँ तक कि पांव कांपने लगे। कच्ची  सड़क पर गाड़ियों के पहियों की लीक पड़ गयी थी। जब कभी लीक में पांव चला जाता तो  मालूम होता किसी गहरे गढ़े में गिर पड़ा हूँ। बार-बार जी में आता, यहीं सड़क के  किनारे लेट जाऊँ। किताबों की छोटी-सी पोटली मन-भर की लगती थी। अपने को कोसता था कि  किताबें लेकर क्यों चला। दूसरी जबान का इम्तहान देने की तैयारी कर रहा था। मगर  छुट्टियों में एक दिन भी तो किताब खोलने की नौबत न आयेगी, खामखाह यह बोझ उठाये चला  आता हूँ। ऐसा जी झुंझलाता था कि इस मूर्खता के बोझ को वहीं पटक दूँ। आखिर टॉँगों  ने चलने से इनकार कर दिया। एक बार मैं गिर पड़ा और और सम्हलकर उठा तो पांव थरथरा  रहे थे। अब  बगैर कुछ खाये पैर उठना दूभर  था, मगर यहां क्या खाऊँ। बार-बार रोने को जी चाहता था। संयोग से एक ईख का खेत नज़र  आया, अब मैं अपने को न रोक सका। चाहता था कि खेत में घुसकर चार-पांच ईख तोड़ लूँ  और मजे से रस चूसता हुआ चलूँ। रास्ता भी कट जाएगा और पेट में कुछ पड़ भी जाएगा।  मगर मेड़ पर पांव रखा ही था कि कांटों में उलझ गया। किसान ने शायद मेंड़ पर कांटे  बिखेर दिये थे। शायद बेर की झाड़ी थी। धोती-कुर्ता सब कांटों में फंसा हुआ , पीछे  हटा तो कांटों की झाड़ी साथ-साथ चलीं, कपड़े छुड़ाना लगा तो हाथ में कांटे चुभने  लगे। जोर से खींचा तो धोती फट गयी। भूख तो गायब हो गयी, फ़िक्र हुई  कि इन नयी मुसीबत  से क्योंकर छुटकारा हो। कांटों को एक जगह से  अलग करता तो दूसरी जगह चिमट जाते, झुकता तो शरीर में चुभते, किसी को पुकारूँ तो  चोरी खुली जाती है, अजीब मुसीबत में पड़ा हुआ था। उस वक्त मुझे अपनी  हालत पर रोना आ गया , कोई रेगिस्तानों की खाक  छानने वाला आशिक भी  इस तरह कांटों में  फंसा होगा ! बड़ी मंश्किल से आध घण्टे में गला  छूटा मगर धोती और कुर्ते के माथे गयी ,हाथ और पांव छलनी हो गये वह घाते में । अब  एक क़दम आगे रखना मुहाल था। मालूम नहीं कितना रास्ता तय हुआ, कितना बाकी है, न कोई  आदमी न आदमज़ाद, किससे पूछूँ। अपनी हालत पर रोता हुआ जा रहा था। एक बड़ा गांव नज़र  आया । बड़ी खुशी हुई। कोई न कोई दुकान मिल ही जाएगी। कुछ खा लूँगा और किसी के  सायबान में पड़ रहूँगा, सुबह देखी जाएगी।

मगर  देहातों में लोग सरे-शाम सोने के आदी होते है। एक आदमी कुएं पर पानी भर रहा था।  उससे पूछा तो उसने बहुत ही निराशाजनक उत्तर दिया—अब  यहां कुछ न मिलेगा। बनिये नमक-तेल रखते हैं। हलवाई की दुकान एक भी नहीं। कोई शहर  थोड़े ही है, इतनी रात तक दुकान खोले कौन बैठा रहे !

मैंने उससे  बड़े विनती के स्वर में कहा-कहीं सोने को जगह मिल जाएगी ?
उसने  पूछा-कौन हो तुम ? तुम्हारी जान – पहचान का यहां कोई नही है ?
‘जान-पहचान का कोई होता तो तुमसे क्यों पूछता ?
‘तो भाई, अनजान आदमी को यहां नहीं ठहरने देंगे । इसी तरह कल एक  मुसाफिर आकर ठहरा था, रात को एक घर में सेंध पड़ गयी, सुबह को मुसाफ़िर का पता न  था।’
‘तो क्या तुम समझते हो, मैं चोर हूँ ?
‘किसी के माथे पर तो लिखा नहीं होता, अन्दर का हाल कौन जाने !
‘नहीं ठहराना चाहते न सही, मगर चोर तो न बनाओ। मैं जानता यह  इतना मनहुस गांव है तो इधर आता ही क्यों ?’

मैंने  ज्यादा खुशामद न की, जी जल गया। सड़क पर आकर फिर आगे चल पड़ा। इस वक्त मेरे होश  ठिकाने न थे। कुछ खबर नहीं किस रास्ते से गांव में आया था और किधर चला जा रहा था।  अब मुझे अपने घर पहुँचने की उम्मीद न थी। रात यों ही भटकते हुए गुज़रेगी, फिर इसका  क्या ग़म कि कहां जा रहा हूँ। मालूम नहीं कितनी देर तक मेरे दिमाग की यह हालत रही।  अचानक एक खेत में आग जलती हुई दिखाई पड़ी कि जैसे आशा का दीपक हो। जरूर वहां कोई  आदमी होगा। शायद रात काटने को जगह मिल जाए। कदम तेज किये और करीब पहुँचा कि यकायक  एक बड़ा-सा कुत्ता भूँकता हुआ मेरी तरफ दौड़ा। इतनी डरावनी आवाज थी कि मैं कांप  उठा। एक पल में वह मेरे सामने आ गया और मेरी तरफ़ लपक-लपककर भूँकने लगा। मेरे  हाथों में किताबों की पोटली के सिवा और क्या था, न कोई लकड़ी थी न पत्थर , कैसे  भगाऊँ, कहीं बदमाश मेरी टांग पकड़ ले तो क्या करूँ !  अंग्रेजी नस्ल का शिकारी कुत्ता मालूम होता था। मैं जितना ही धत्-धत् करता था उतना  ही वह गरजता था। मैं खामोश खड़ा हो गया और पोटली जमीन पर रखकर पांव से जूते निकाल  लिये, अपनी हिफ़ाजत के लिए कोई हथियार तो हाथ में हो ! उसकी तरफ़ गौर सें देख रहा था कि खतरनाक हद तक मेरे करीब आये  तो उसके सिर पर इतने जोर से नालदार जूता मार दूं कि याद ही तो करे लेकिन शायद उसने  मेरी नियत ताड़ ली और इस तरह मेरी तरफ़ झपटा कि मैं कांप गया और जूते हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़े। और उसी वक्त मैंने डरी हुई आवाज  में पुकारा-अरे खेत में कोई है, देखो यह कुत्ता मुझे काट रहा है ! ओ महतो, देखो तुम्हारा कुत्ता मुझे काट रहा है।

जवाब मिला—कौन है ?
‘मैं हूँ, राहगीर, तुम्हारा कुत्ता मुझे काट रहा है।’
नहीं, काटेगा नहीं , डरो मत। कहां जाना है ?
‘महमूदनगर।
‘महमूदनगर का रास्ता तो तुम पीछे छोड़ आये, आगे तो नदी हैं।’
 मेरा कलेजा  बैठ गया, रुआंसा होकर बोला—महमूदनगर का रास्ता कितनी  दूर छूट गया है ?
‘यही कोई तीन मील।’
और एक  लहीम-शहीम आदमी हाथ में लालटन लिये हुए आकर मेरे आमने खड़ा हो गया। सर पर हैट था,  एक मोटा फ़ौजी ओवरकोट पहने हुए, नीचे निकर, पांव में फुलबूट, बड़ा लंबा-तड़ंगा,  बड़ी-बड़ी मूँछें, गोरा रंग, साकार पुरुस-सौन्दर्य। बोला—तु    म तो कोई स्कूल  के लडके मालूम होते हो।
लड़का तो नहीं हूँ, लड़कों का मुदर्रिस हूँ, घर जा रहा हूँ।  आज से तीन दिन की छुट्टी है।’
‘तो रेल से क्यों नहीं गये ?’
 रेल छूट  गयी और दूसरी एक बजे छूटती है।’
‘वह अभी तुम्हें मिल जाएगी। बारह का अमल है। चलो मैं स्टेशन का  रास्ता दिखा दूँ।’
‘कौन-से स्टेशन का ?
‘भगवन्तपुर का।’
‘भगवन्तपुर ही से तो मैं चला हूँ। वह बहुत पीछे छूट गया होगा।’
‘बिल्कुल नहीं, तुम भगवन्तपुर स्टेशन से एक मील के अन्दर खड़े  हो। चलो मैं तुम्हें स्टेशन का रास्ता दिखा दूँ। अभी गाड़ी मिल जाएगी। लेकिन रहना  चाहो तो मेरे झोंपड़े में लेट जाओ। कल चले जाना।’
अपने ऊपर  गुस्सा आया कि सिर पीट लूं। पांच बजे से तेली के बैल की तरह घूम रहा हूँ और अभी  भगवन्तपुर से कुल एक मील आया हूँ। रास्ता भूल गया। यह घटना भी याद रहेगी कि चला छ:  घण्टे और तय किया एक मील। घर पहुँचने  की  धुन जैसे और भी दहक उठी।
बोला—नहीं , कल तो होली है। मुझे रात को पहुँच जाना चाहिए।
‘मगर रास्ता पहाड़ी है, ऐसा न हो कोई जानवर मिल जाए। अच्छा  चलो, मैं तुम्हें पहुँचाये देता हूँ, मगर तुमने बड़ी गलती की , अनजान रास्ते को  पैदल चलना कितना खतरनाक है। अच्छा चला मैं पहुँचाये देता हूँ। ख़ैर, खड़े रहो, मैं  अभी आता हूँ।’

कुत्ता दुम  हिलाने लगा और मुझसे दोस्ती करने का इच्छुक जान पड़ा। दुम हिलाता हुआ, सिर झुकाये  क्षमा-याचना के रूप में मेरे सामने आकर खड़ा हुआ। मैंने भी बड़ी उदारता से उसका  अपराध क्षमा कर दिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगा। क्षण—भर में वह आदमी बन्दूक कंधे पर रखे आ गया और बोला—चलो, मगर अब ऐसी नादानी न करना, ख़ैरियत हुई कि मैं तुम्हें  मिल गया। नदी पर पहुँच जाते तो जरूर किसी जानवर से मुठभेड़ हो जाती। 

 मैंने पूछा—आप तो कोई अंग्रेज मालूम होते हैं मगर आपकी बोली बिलकुल हमारे  जैसी है ?

उसने हंसकर  कहा—हां, मेरा बाप अंग्रेज था, फौजी  अफ़सर। मेरी उम्र यहीं गुज़री है। मेरी मां उसका खाना पकाती थी। मैं भी फ़ौज में  रह चुका हूँ। योरोप की लड़ाई में गया था, अब पेंशन पाता हूँ। लड़ाई में मैंने जो  दृश्य अपनी आंखों से देखे और जिन हालात में मुझे जिन्दगी बसर करनी पड़ी और मुझे  अपनी इन्सानियत का जितना खून करना पड़ा उससे इस पेशे से मुझे नफ़रत हो गई और मैं  पेंशन लेकर यहां चला आया । मेरे पापा ने यहीं एक छोटा-सा घर बना लिया था। मैं यहीं  रहता हूँ और आस-पास के खेतों की रखवाली करता हूँ। यह गंगा की धाटी है। चारों तरफ  पहाड़ियां हैं। जंगली जानवर बहुत लगते है। सुअर, नीलगाय, हिरन सारी खेती बर्बाद कर  देते हैं। मेरा काम है, जानवरों से खेती की हिफ़ाजत करना। किसानों से मुझे हल पीछे  एक मन गल्ला मिल जाता है। वह मेरे गुज़र-बसर के लिए काफी होता है। मेरी बुढ़िया  मां अभी जिन्दा है। जिस तरह पापा का खाना पकाती थी , उसी तरह अब मेरा खाना पकाती  है। कभी-कभी मेरे पास आया करो, मैं तुम्हें कसरत करना सिखा दूँगा, साल-भर मे  पहलवान हो जाओगे।

मैंने पूछा—आप अभी तक कसरत करते हैं?

वह बोला—हां, दो घण्टे रोजाना कसरत करता हूँ। मुगदर और लेज़िम का मुझे  बहुत शौक है। मेरा पचासवां साल है, मगर एक सांस में पांच मील दौड़ सकता हूँ। कसरत  न करूँ तो इस जंगल में रहूँ कैसे। मैंने खूब कुश्तियां लड़ी है। अपनी रेजीमेण्ट में खूब मज़बूत आदमी था। मगर अब इस फौजी  जिन्दगी की हालातों पर गौर करता हूँ तो शर्म और अफ़सोस से मेरा सर झुक जाता है।  कितने ही बेगुनाह मेरी रायफल के शिकार हुएं मेरा उन्होंने क्या नुकसान किया था ?  मेरी उनसे कौन-सी अदावत थी? मुझे तो जर्मन और आस्ट्रियन सिपाही भी वैसे ही सच्चे,  वैसे ही बहादुर, वैसे ही खुशमिज़ाज, वेसे ही हमदर्द मालूम हुए जैसे फ्रांस या  इंग्लैण्ड के । हमारी उनसे खूब दोस्ती हो गयी थी, साथ खेलते थे, साथ बैठते थे, यह  खयाल ही न आता था कि यह लोग हमारे अपने नही हैं। मगर फिर भी हम एक-दूसरे के खून के  प्यासे थे। किसलिए ? इसलिए कि बड़े-बड़े अंग्रेज सौदागरों को खतरा था कि कहीं  जर्मनी उनका रोज़गार न छीन ले। यह सौदागरों का राज है। हमारी फ़ौजें उन्हीं के इशारों  पर नाचनेवाली कठपुतलियां हैं। जान हम गरीबों की गयी, जेबें गर्म हुई मोटे-मोटे  सौदागरों की । उस वक्त हमारी ऐसी खातिर होती थी, ऐसी पीठ ठोंकी जाती थी, गोया हम  सल्तनत के दामाद हैं। हमारे ऊपर फूलों की बारिश होती थी, हमें गाईन पार्टियां दी  जाती थीं, हमारी बहादुरी की कहानियां रोजाना अखबारों में तस्वीरों के साथ छपती  थीं। नाजुक-बदल लेडियां और शहज़ादियां हमारे लिए कपड़े सीती थीं, तरह-तरह के  मुरब्बे और अचार बना-बना कर भेजती थीं। लेकिन जब सुलह हो गयी तो उन्ही जांबाजों को  कोई टके को भी न पूछता था। कितनों ही के अंग भंग हो गये थे, कोई लूला हो गया था,  कोई लंगड़ा,कोई अंधा। उन्हें एक टुकड़ा रोटी भी देनेवाला कोई न था। मैंने कितनों  ही को सड़क पर भीख मांगते देखा। तब से मुझे इस पेशे से नफ़रत हो गयी। मैंने यहॉँ  आकर यह काम अपने जिम्मे ले लिया और खुश हूँ। सिपहगिरी इसलिए है कि उससे गरीबों की  जानमाल की हिफ़ाजत हो, इसलिए नहीं कि करोड़पतियों की बेशुमार दौलत और बढ़े। यहां  मेरी जान हमेशा खतरे में बनी रहती है। कई बार मरते-मरते बचा हूँ लेकिन इस काम में  मर भी जाऊँ तो मुझे अफ़सोस न होगा, क्योंकि मुझे यह तस्कीन होगा कि मेरी जिन्दगी  ग़रीबों के काम आयी। और यह बेचारे किसान मेरी कितनी खातिर करते हैं कि तुमसे क्या  कहूँ। अगर मैं बीमर पड़ जाऊँ और उन्हें मालू हो जाए कि मैं उनके शरीर के ताजे खून  से अच्छा हो जाऊँगा तो बिना झिझके अपना खून दे देंगे। पहले मैं बहुत शराब पीता था।  मेरी बिरादरी को तो तुम लोग जानते होगे। हममें बहुत ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिनको  खाना मयस्सर हो या न हो मगर शराब जरूर चाहिए। मैं भी एक बोतल शराब रोज़ पी जाता  था। बाप ने काफी पैसे छोड़े थे। अगर किफ़ायत से रहना जानता तो जिन्दगी-भर आराम से  पड़ा रहता। मगर शराब ने सत्यानाश कर दिया। उन दिनों मैं बड़े ठाठ से रहता था। कालर  –टाई लगाये, छैला बना हुआ, नौजवान छोकरियों से आंखें  लड़ाया करता था। घुड़दौड़ में जुआ खेलना, शरीब पीना, क्लब में ताश खेलना और औरतों  से दिल बहलाना, यही मेरी जिन्दगी थी । तीन-चार साल में मैंने पचीस-तीस हजार रुपये  उड़ा दिये। कौड़ी कफ़न को न रखी। जब पैसे खतम हो गये तो रोजी की फिक्र हुई। फौज  में भर्ती हो गया। मगर खुदा का शुक्र है कि वहां से कुछ सीखकर लौटा यह सच्चाई मुझ  पर खुल गयी कि बहादुर का काम जान लेना नहीं, बल्कि जान की हिफ़ाजत करना है।

‘योरोप से आकर एक दिन मैं शिकार खेलने लगा और इधर आ गया। देखा,  कई किसान अपने खेतों के किनारे उदास खड़े हैं मैंने पूछा क्या बात है ? तुम लोग  क्यों इस तरह उदास खड़े हो ? एक आदमी ने कहा—क्या करें साहब, जिन्दगी से  तंग हैं। न मौत आती है न पैदावार होती है। सारे जानवर आकर खेत चर जाते हैं। किसके  घर से लगान चुकायें, क्या महाजन को दें, क्या अमलों को दें और क्या खुद खायें ? कल  इन्ही खेतो को देखकर दिल की कली खिल जाती थी, आज इन्हे देखकर आंखों मे आंसू आ जाते  है जानवरों ने सफ़ाया कर दिया ।

‘मालूम नहीं उस वक्त मेरे दिल पर किस देवता या पैगम्बर का साया  था कि मुझे उन पर रहम आ गया। मैने कहा—आज से मै तुम्हारे खेतो की  रखवाली करूंगा। क्या मजाल कि कोई जानवर फटक सके । एक दाना जो जाय तो जुर्माना दूँ।  बस, उस दिन से आज तक मेरा यही काम है। आज दस साल हो गये, मैंने कभी नागा नहीं  किया। अपना गुज़र भी होता है और एहसान मुफ्त मिलता है और सबसे बड़ी बात यह है कि  इस काम से दिल की खुशी होती है।’

नदी आ गयी।  मैने देखा वही घाट है जहां शाम को किश्ती पर बैठा था। उस चांदनी में नदी जड़ाऊ  गहनों से लदी हुई जैसे कोई सुनहरा सपना देख रही हो।

मैंने पूछा—आपका नाम क्या है ? कभी-कभी आपके दर्शन के लिए आया करूँगा।
उसने  लालटेन उठाकर मेरा चेहरा देखा और बोला –मेरा नाम जैक्सन है। बिल  जैक्सन। जरूर आना। स्टेशन के पास जिससे मेरा नाम पूछोगे, मेरा पता बतला देगा।

यह कहकर वह  पीछे की तरफ़ मुड़ा, मगर यकायक लौट पड़ा और बोला— मगर  तुम्हें यहां सारी रात बैठना पड़ेगा और तुम्हारी अम्मां घबरा रही होगी। तुम मेरे  कंधे पर बैठ जाओ तो मैं तुम्हें उस पार पहुँचा दूँ। आजकल पानी बहुत कम है, मैं तो  अक्सर तैर आता  हूँ।

मैंने  एहसान से दबकर कहा—आपने यही क्या कम इनायत की है कि  मुझे यहां तक पहुँचा दिया, वर्ना शायद घर पहुँचना नसीब न होता। मैं यहां बैठा  रहूँगा और सुबह को किश्ती से पार उतर जाऊँगा।

‘वाह, और तुम्हारी अम्मां रोती होंगी कि मेरे लाड़ले पर न जाने  क्या गुज़री ?’

यह कहकर  मिस्टर जैक्सन ने मुझे झट उठाकर कंधे पर बिठा लिया और इस तरह बेधड़क पानी में घुसे  कि जैसे सूखी जमीन है । मैं दोनों हाथों से उनकी गरदन पकड़े हूँ, फिर भी सीना धड़क  रहा है और रगों में सनसनी-सी मालूम हो रही है। मगर जैक्सन साहब इत्मीनान से चले जा  रहे हैं। पानी घुटने तक आया, फिर कमर तक पहुँचा, ओफ्फोह सीने तक पहुँच गया। अब  साहब को एक-एक क़दम मुश्किल हो रहा है। मेरी जान निकल रही है। लहरें उनके गले लिपट  रही हैं मेरे पांव भी चूमने लगीं । मेरा जी चाहता है उनसे कहूँ भगवान् के लिए वापस  चलिए, मगर ज़बान नहीं खुलती। चेतना ने जैसे इस संकट का सामना करने के लिए सब  दरवाजे बन्द कर लिए । डरता हूँ कहीं जैक्सन साहब फिसले तो अपना काम तमाम है। यह तो  तैराक़ है, निकल जाएंगे, मैं लहरों की खुराक बन जाऊँगा। अफ़सोस आता है अपनी  बेवकूफी पर कि तैरना क्यों न सीख लिया ? यकायक जैक्सन ने मुझे दोनों हाथों से  कंधें के ऊपर उठा लिया। हम बीच धार में पहुँच गये थे। बहाव में इतनी तेजी थी कि  एक-एक क़दम आगे रखने में एक-एक मिनट लग जाता था। दिन को इस नदी में कितनी ही बार आ  चुका था लेकिन रात  को और इस मझधार में वह  बहती हुई मौत मालूम होती थी दस –बारह क़दम तक मैं जैक्सन के  दोनों हाथों पर टंगा रहा। फिर पानी उतरने लगा। मैं देख न सका, मगर शायद पानी  जैक्सन के सर के ऊपर तक आ गया था। इसीलिए उन्होंने मुझे हाथों पर बिठा लिया था। जब  गर्दन बाहर निकल आयी तो जोर से हंसकर बोले—लो अब पहुँच गये।<

मैंने कहा—आपको आज मेरी वजह से बड़ी तकलीफ़ हुई।

जैक्सन ने  मुझे हाथों से उतारकर फिर कंधे पर बिठाते हुए कहा—और आज  मुझे जितनी खुशी हुई उतनी आज तक कभी न हुई थी, जर्मन कप्तान को कत्ल करके भी नहीं।  अपनी मॉँ से कहना मुझे दुआ दें।

घाट पर  पहुँचकर मैं साहब से रुखसत हुआ, उनकी सज्जनता, नि:स्वार्थ सेवा, और अदम्य साहस का  न मिटने वाला असर दिल पर लिए हुए। मेरे जी में आया, काश मैं भी इस तरह लोगों के  काम आ सकता।

तीन बजे  रात को जब मैं घर पहुँचा तो होली में आग लग रही थी। मैं स्टेशन से दो मील सरपट  दौड़ता हुआ गया। मालूम नहीं भूखे शरीर में दतनी ताक़त कहां से आ गयी  थी।

अम्मां  मेरी आवाज सुनते ही आंगन में निकल आयीं और मुझे छाती से लगा लिया और बोली—इतनी रात कहां कर दी, मैं तो सांझ से तुम्हारी राह देख रही  थी, चलो खाना खा लो, कुछ खाया-पिया है कि नहीं ?

वह अब  स्वर्ग में हैं। लेकिन उनका वह मुहब्बत–भरा चेहरा मेरी आंखों के  सामने है और वह प्यार-भरी आवाज कानों में गूंज रही है।

मिस्टर  जैक्सन से कई बार मिल चुका हूँ। उसकी सज्जनता ने मुझे उसका भक्त बना दिया हैं। मैं  उसे इन्सान नहीं फरिश्ता समझता हूँ।

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                                                             स्त्री और पुरुष

स्त्री और पुरुष Premchand Story
विपिन बाबू के लिए स्त्री ही संसार की सुन्दर वस्तु  थी। वह कवि थे और उनकी कविता के लिए   स्त्रियों के रुप और यौवन की प्रशसा ही सबसे चिंताकर्षक विषय था। उनकी  दृष्टि में स्त्री जगत में व्याप्त कोमलता, माधुर्य और अलंकारों की सजीव प्रतिमा  थी। जबान पर स्त्री का नाम आते ही उनकी आंखे जगमगा उठती थीं, कान खड़ें हो जाते  थे, मानो किसी रसिक ने गाने की आवाज सुन ली हो। जब से होश संभाला, तभी से उन्होंने  उस सुंदरी की कल्पना करनी शुरु की जो उसके हृदय की रानी होगी; उसमें ऊषा की प्रफुल्लता होगी, पुष्प की कोमलता, कुंदन की  चमक, बसंत की छवि, कोयल की ध्वनि—वह कवि वर्णित सभी उपमाओं से  विभूषित होगी। वह उस कल्पित मूत्रि के उपासक थे, कविताओं में उसका गुण गाते, वह  दिन भी समीप आ गया था, जब उनकी आशाएं हरे-हरे पत्तों से लहरायेंगी, उनकी मुरादें  पूरी हो होगी। कालेज की अंतिम परीक्षा समाप्त हो गयी थी और विवाह के संदेशे आने  लगे थे।

विवाह तय हो गया। बिपिन बाबू ने कन्या को देखने का  बहुत आग्रह किया, लेकिन जब उनके मांमू ने विश्वास दिलाया कि लड़की बहुत ही रुपवती  है, मैंने अपनी आंखों से देखा है, तब वह राजी हो गये। धूमधाम से बारात निकली और  विवाह का मुहूर्त आया। वधू आभूषणों से सजी हुई मंडप में आयी तो विपिन को उसके  हाथ-पांव नजर आये। कितनी सुंदर उंगलिया थीं, मानों दीप-शिखाएं हो, अंगो की शोभा  कितनी मनोहारिणी थी। विपिन फूले न समाये। दूसरे दिन वधू विदा हुई तो वह उसके  दर्शनों के लिए इतने अधीर हुए कि ज्यों ही रास्ते में कहारों ने पालकी रखकर  मुंह-हाथ धोना शुरु किया, आप चुपके से वधू  के पास जा पहुंचे। वह घूंघट हटाये, पालकी से सिर निकाले बाहर  झांक रही थी। विपिन की निगाह उस पर पड़ गयी। यह वह परम सुंदर रमणी न थी जिसकी  उन्होने कल्पना की थी, जिसकी वह बरसों से कल्पना कर रहे थे---यह एक चौड़े मुंह,  चिपटी नाक, और फुले हुए गालों वाली कुरुपा स्त्री थी। रंग गोरा था, पर उसमें लाली  के बदले सफदी थी; और फिर रंग कैसा ही सुंदर हो, रुप  की कमी नहीं पूरी कर सकता। विपिन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया---हां! इसे मेरे ही गले पड़ना था। क्या इसके लिए समस्त संसार में और  कोई न मिलता था? उन्हें अपने मांमू पर क्रोध आया जिसने वधू की तारीफों के पुल बांध  दिये थे। अगर इस वक्त वह मिल जाते तो विपिन उनकी ऐसी खबर लेता कि वह भी याद करते।

जब कहारों  ने फिर पालकियां उठायीं तो विपिन मन में सोचने लगा, इस स्त्री के साथ कैसे मैं  बोलूगा, कैसे इसके साथ जीवन काटंगा। इसकी ओर तो   ताकने ही से घृणा होती है। ऐसी कुरुपा स्त्रियां  भी संसार में हैं, इसका मुझे अब तक पता न था।  क्या मुंह ईश्वर ने बनाया है, क्या आंखे है! मैं और सारे ऐबों की ओर से  आंखे बंद कर लेता, लेकिन वह चौड़ा-सा मुंह! भगवान्! क्या तुम्हें मुझी पर यह वज्रपात करना था।

विपिन हो अपना जीवन नरक-सा जान पड़ता था। वह अपने  मांमू से लड़ा। ससुर को लंबा खर्रा लिखकर फटकारा, मां-बाप से हुज्जत की और जब इससे  शांति न हुई तो कहीं भाग जाने की बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया अवश्य आती थी। वह  अपने का समझाता कि इसमें उस बेचारी का क्या दोष है, उसने जबरदस्ती  तो मुझसे विवाह किया  नहीं। लेकिन यह दया और यह विचार उस घृणा को न जीत सकता था जो आशा को देखते ही उसके  रोम-रोम में व्याप्त  हो जाती थी। आशा अपने  अच्छे-से-अच्छे कपड़े पहनती; तरह-तरह से बाल संवारती,  घंटो आइने के सामने खड़ी होकर अपना श्रृंगार करती, लेकन विपिन को यह शुतुरगमज-से  मालूम होते। वह दिल से चाहती थी कि उन्हें प्रसन्न करुं, उनकी सेवा करने के लिए  अवसर खोजा करती थी; लेकिन विपिन उससे भागा-भागा फिरता  था। अगर कभी भेंट हो जाती तो कुछ ऐसी जली-कटी बातें करने लगता कि आशा रोती हुई  वहां से चली जाती।

सबसे बुरी बात यह थी कि उसका चरित्र भ्रष्ट होने लगा।  वह यह भूल जाने की चेष्टा करने लगा कि मेरा विवाह हो गया है। कई-कई दिनों क आशा को उसके दर्शन भी न होते। वह उसके कहकहे की आवाजे बाहर  से आती हुई सुनती, झरोखे से देखती कि वह दोस्तों के गले में हाथ डालें सैर करने जा  रहे है और तड़प कर रहे जाती।
एक दिन खाना खाते समय उसने कहा—अब तो आपके दर्शन ही नहीं होतें। मेरे कारण घर छोड़ दीजिएगा  क्या ?

 विपिन ने मुंह फेर कर कहा—घर ही पर तो रहता हूं। आजकल जरा नौकरी की तलाश है इसलिए  दौड़-धूप ज्यादा करनी पड़ती है।

आशा—किसी  डाक्टर से मेरी सूरत क्यों नहीं बनवा देते ? सुनती हूं, आजकल सूरत बनाने वाले  डाक्टर पैदा हुए है।
विपिन— क्यों  नाहक चिढ़ती हो, यहां तुम्हे किसने बुलाया था ?
आशा— आखिर  इस मर्ज की दवा कौन करेंगा ?

विपिन— इस  मर्ज की दवा नहीं है। जो काम ईश्चर से ने करते बना उसे आदमी क्या बना सकता है ?

आशा – यह  तो तुम्ही सोचो कि ईश्वर की भुल के लिए मुझे दंड दे रहे हो। संसार में कौन ऐसा  आदमी है जिसे अच्छी सूरत बुरी लगती हो,      किन तुमने किसी मर्द को केवल रुपहीन होने के  कारण क्वांरा रहते देखा है, रुपहीन लड़कियां भी मां-बाप के घर नहीं बैठी रहतीं।  किसी-न-किसी तरह उनका निर्वाह हो ही जाता है; उसका पति उप पर प्राण ने देता हो,  लेकिन दूध की मक्खी नहीं समझता।

विपिन ने झुंझला कर कहा—क्यों नाहक सिर खाती हो, मै तुमसे बहस तो नहीं कर रहा हूं।  दिल पर जब्र नहीं किया जा सकता और न दलीलों का उस पर कोई असर पड़ सकता है। मैं  तुम्हे कुछ कहता तो नहीं हूं, फिर तुम क्यों मुझसे हुज्जत करती हो ?

आशा यह झिड़की सुन कर चली गयी। उसे  मालूम हो गया कि इन्होने मेरी ओर से सदा के लिए ह्रदय कठोर कर लिया है।
विपिन तो रोज सैर-सपाटे करते, कभी-कभी रात को गायब  रहते। इधर आशा चिंता और नैराश्य से घुलते-घुलते बीमार पड़ गयी। लेकिन विपिन भूल कर  भी उसे देखने न आता, सेवा करना तो दूर रहा। इतना ही नहीं, वह दिल में मानता था कि  वह मर जाती तो गला छुटता, अबकी खुब देखभाल कर अपनी पसंद का विवाह करता।

अब वह और भी खुल खेला। पहले आशा से  कुछ दबता था, कम-से-कम उसे यह धड़का लगा रहता था कि कोई मेरी चाल-ढ़ाल पर निगाह  रखने वाला भी है। अब वह धड़का छुट गया। कुवासनाओं में ऐसा लिप्त हो गया कि मरदाने  कमरे में ही जमघटे होने लगे। लेकिन विषय-भोग में धन ही का सर्वनाश होता, इससे कहीं  अधिक बुद्धि और बल का सर्वनाश होता है। विपिन का चेहरा पीला लगा, देह भी क्षीण  होने लगी, पसलियों की हड्डियां निकल आयीं आंखों के इर्द-गिर्द गढ़े पड़ गये। अब वह  पहले से कहीं ज्यादा शोक करता, नित्य तेल लगता, बाल बनवाता, कपड़े बदलता, किन्तु  मुख पर कांति न थी, रंग-रोगन से क्या हो सकता ?

 एक दिन आशा बरामदे में चारपाई पर  लेटी हुई थी। इधर हफ्तों से उसने विपिन को न देखा था। उन्हे देखने की इच्छा हुई।  उसे भय था कि वह सन आयेंगे, फिर भी वह मन को न रोक सकी। विपिन को बुला भेजा। विपिन  को भी उस पर कुछ दया आ गयी आ गयी। आकार सामने खड़े हो गये। आशा ने उनके मुंह की ओर  देखा तो चौक पड़ी। वह इतने दुर्बल हो गये थे कि पहचनाना मुशिकल था। बोली—तुम भी बीमार हो क्या? तुम तो मुझसे भी ज्यादा घुल गये हो।

विपिन—उंह,  जिंदगी में रखा ही क्या है जिसके लिए जीने की फिक्र करुं !

आशा—जीने  की फिक्र न करने से कोई इतना दुबला नहीं हो जाता। तुम अपनी कोई दवा क्यों नहीं  करते?

यह कह कर उसने विपिन का दाहिन हाथ  पकड़ कर अपनी चारपाई पर बैठा लिया। विपिन ने भी हाथ छुड़ाने की चेष्टा न की। उनके  स्वाभाव में इस समय एक विचित्र नम्रता थी, जो आशा ने कभी ने देखी थी। बातों से भी  निराशा टपकती थी। अक्खड़पन या क्रोध की गंध भी न थी। आशा का ऐसा मालुम हुआ कि उनकी  आंखो में आंसू भरे हुए है।

विपिन चारपाई पर बैठते हुए बोले—मेरी दवा अब मौत करेगी। मै तुम्हें जलाने के लिए नहीं कहता।  ईश्वर जानता है, मैं तुम्हे चोट नहीं पहुंचाना चाहता। मै अब ज्यादा दिनों तक न  जिऊंगा। मुझे किसी भयंकर रोग के लक्षण दिखाई दे रहे है। डाक्टर नें भी वही कहा है।  मुझे इसका खेद है कि मेरे हाथों तुम्हे कष्ट पहुंचा पर क्षमा करना। कभी-कभी  बैठे-बैठे मेरा दिल डूब दिल डूब जाता है, मूर्छा-सी आ जाती है।

यह कहतें-कहते एकाएक वह कांप उठे। सारी देह में सनसनी  सी दौड़ गयी। मूर्छित हो कर चारपाई पर गिर पड़े और हाथ-पैर पटकने लगे।

मुंह से फिचकुर निकलने लगा। सारी देह पसीने से तर हो  गयी।

आशा  का सारा रोग हवा हो गया। वह महीनों से बिस्तर न छोड़ सकी थी। पर इस समय उसके शिथिल  अंगो में विचित्र स्फुर्ति दौड़ गयी। उसने तेजी से उठ कर विपिन को अच्छी तरह लेटा  दिया और उनके मुख पर पानी के छींटे देने लगी। महरी भी दौड़ी आयी और पंखा झलने लगी।  पर भी विपिन ने आंखें न खोलीं। संध्या होते-होते उनका मुंह टेढ़ा हो गया और बायां  अंग शुन्य पड़ गया। हिलाना तो दूर रहा, मूंह से बात निकालना भी मुश्किल हो गया। यह  मूर्छा न थी, फालिज था।

फालिज के भयंकर रोग में रोगी की सेवा करना आसान काम  नहीं है। उस पर आशा महीनों से बीमार थी। लेकिन उस रोग के सामने वह पना रोग भूल गई।  15 दिनों तक विपिन की हालत बहुत नाजुक रही। आशा दिन-के-दिन और रात-की-रात उनके  पास  बैठी रहती। उनके लिए पथ्य बनाना,  उन्हें गोद में सम्भाल कर दवा पिलाना, उनके जरा-जरा से इशारों को समझाना उसी जैसी  धैयशाली स्त्री का काम था। अपना सिर दर्द से फटा करता, ज्वर से देह तपा करती, पर  इसकी उसे जरा भी परवा न थी।

१५ दिनों बाद विपिन की हालत कुछ  सम्भली। उनका दाहिना पैर तो लुंज पड़ गया था, पर तोतली भाषा में कुछ बोलने लगे थे।  सबसे बुरी गत उनके सुन्दर मुख की हुई थी। वह इतना टेढ़ा हो गया था जैसे कोई रबर के  खिलौने को खींच कर बढ़ा दें। बैटरी की मदद से जरा देर के लिए बैठे या खड़े तो हो  जाते थे­; लेकिन चलने−फिरने की ताकत न थी।

एक दिनों लेटे−लेटे उन्हे क्या ख्याल  आया। आईना उठा कर अपना मुंह देखने लगे। ऐसा कुरुप आदमी उन्होने कभी न देखा था।  आहिस्ता से बोले−−आशा, ईश्वर ने मुझे गरुर की सजा दे दी। वास्तव में मुझे यह उसी  बुराई का बदला मिला है, जो मैने तुम्हारे साथ की। अब तुम अगर मेरा मुंह देखकर घृणा  से मुंह फेर लो तो मुझेसे उस दुर्व्यवहार का बदला लो, जो मैने, तुम्हारे साथ किए  है।

आशा ने पति की ओर कोमल भाव से देखकर  कहा−−मै तो आपको अब भी उसी निगाह से देखती हुं। मुझे तो आप में कोई अन्तर नहीं  दिखाई देता।

विपिन−−वाह, बन्दर का−सा मुंह हो गया है, तुम कहती हो  कि कोई अन्तर ही नहीं। मैं तो अब कभी बाहर न निकलूंगा। ईश्वर ने मुझे सचमुच दंड  दिया।
बहुत यत्न किए गए पर विपिन का मुंह  सीधा न हुआ। मुख्य का बायां भाग इतना टेढ़ा हो गया था कि चेहरा देखकर डर मालूम  होता था। हां, पैरों में इतनी शक्ति आ गई कि अब वह चलने−फिरने लगे।

आशा ने पति की बीमारी में देवी की  मनौती की थी। आज उसी की पुजा का उत्सव था। मुहल्ले की स्त्रियां बनाव−सिंगार किये  जमा थीं। गाना−बजाना हो रहा था।
एक सेहली ने पुछा−−क्यों आशा, अब तो  तुम्हें उनका मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा।
 आशा ने गम्भीर होकर कहा−−मुझे तो  पहले से कहीं मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा।
‘चलों, बातें बनाती हो।’

‘नही बहन, सच कहती हुं; रुप के बदले मुझे उनकी आत्मा मिल गई जो  रुप से कहीं बढ़कर है।’

कमरे  में एक खिड़की थी जो आंगन में खुलती थी। इस वक्त वह बन्दव थी। एक मित्र ने उसे  चुपके से खोल दिया। एक मित्र ने उसे चुपके दिया और शीशे से झांक कर विपिन से कहा−−  आज तो तुम्हारे यहां पारियों का अच्छा जमघट है।

विपिन−−बन्दा कर दो।

‘अजी जरा देखो तो: कैसी−कैसी सूरतें है ! तुम्हे इन सबों में  कौन सबसे अच्छी मालूम होती है ?
विपिन ने उड़ती हुई नजरों से देखकर  कहा−−मुझे तो वहीं सबसे अच्छी मालूम होती है जो थाल में फुल रख रही है।

‘वाह री आपकी निगाह ! क्या सूरत के साथ तुम्हारी निगाह भी  बिगड़ गई? मुझे तो वह सबसे बदसुरत मालूम होती है।’
‘इसलिए कि तुम उसकी सूरत देखते हो और मै उसकी आत्मा देखता हूं।’

‘अच्छा, यही मिसेज विपिन हैं?’

‘जी हां, यह वही देवी है।

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